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द्रोण पर्व
अध्याय ११४
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सञ्जय़ उवाच
चापादाधिरथेर्मुक्ताः प्रपतन्तः स्म साय़काः |  ३०   क
एको दीर्घ इव प्रांशुः प्रभवन्दृश्यते शरः ||  ३०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति