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द्रोण पर्व
अध्याय ११४
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सञ्जय़ उवाच
पर्वतं वारिधाराभिश्छादय़न्निव तोय़दः |  ३१   क
कर्णः प्राच्छादय़त्क्रुद्धो भीमं साय़कवृष्टिभिः ||  ३१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति