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द्रोण पर्व
अध्याय ११४
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सञ्जय़ उवाच
तां समुद्रमिवोद्धूतां शरवृष्टिं समुत्थिताम् |  ३३   क
अचिन्तय़ित्वा भीमस्तु क्रुद्धः कर्णमुपाद्रवत् ||  ३३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति