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आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ४२
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सूत उवाच
अविनाशी तथा नित्यं क्षेत्रज्ञ इति निश्चय़ः |  ७   क
भूतानामात्मभावो यो ध्रुवोऽसौ संविजानताम् ||  ७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति