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द्रोण पर्व
अध्याय ११४
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सञ्जय़ उवाच
कर्णस्य शरजालौघैर्भीमसेनस्य चोभय़ोः |  ३७   क
अग्निस्फुलिङ्गसंस्पर्शैरञ्जोगतिभिराहवे |  ३७   ख
तैस्तैः कनकपुङ्खानां द्यौरासीत्संवृता व्रजैः ||  ३७   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति