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द्रोण पर्व
अध्याय ११४
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सञ्जय़ उवाच
स कुण्डलं महत्कर्णात्कर्णस्यापातय़द्भुवि |  ४   क
तपनीय़ं महाराज दीप्तं ज्योतिरिवाम्वरात् ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति