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द्रोण पर्व
अध्याय ११४
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सञ्जय़ उवाच
तद्विहत्यास्य राधेय़स्तत एनं समभ्ययात् |  ५९   क
संरव्धः पाण्डवं सङ्ख्ये युद्धाय़ समुपस्थितम् ||  ५९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति