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द्रोण पर्व
अध्याय ११४
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सञ्जय़ उवाच
हस्तिनां व्रजमासाद्य रथदुर्गं प्रविश्य च |  ६३   क
पाण्डवो जीविताकाङ्क्षी राधेय़ं नाभ्यहारय़त् ||  ६३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति