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द्रोण पर्व
अध्याय ११४
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सञ्जय़ उवाच
व्यवस्थानमथाकाङ्क्षन्धनञ्जय़शरैर्हतम् |  ६४   क
उद्यम्य कुञ्जरं पार्थस्तस्थौ परपुरञ्जय़ः ||  ६४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति