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द्रोण पर्व
अध्याय ११४
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सञ्जय़ उवाच
ते ललाटं समासाद्य सूतपुत्रस्य मारिष |  ७   क
विविशुश्चोदितास्तेन वल्मीकमिव पन्नगाः ||  ७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति