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द्रोण पर्व
अध्याय ११४
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सञ्जय़ उवाच
यत्र भोज्यं वहुविधं भक्ष्यं पेय़ं च पाण्डव |  ७०   क
तत्र त्वं दुर्मते योग्यो न युद्धेषु कथञ्चन ||  ७०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति