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द्रोण पर्व
अध्याय ११४
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सञ्जय़ उवाच
अथैनं तत्र संलीनमस्पृशद्धनुषा पुनः |  ७७   क
प्रहसंश्च पुनर्वाक्यं भीममाह वृषस्तदा ||  ७७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति