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द्रोण पर्व
अध्याय ११४
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सञ्जय़ उवाच
ततो द्रौणिं चतुःषष्ट्या विव्याध कुपितोऽर्जुनः |  ८९   क
शिलीमुखैर्महाराज मा गास्तिष्ठेति चाव्रवीत् ||  ८९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति