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द्रोण पर्व
अध्याय ११४
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सञ्जय़ उवाच
ततः सुवर्णपृष्ठानां धनुषां कूजतां रणे |  ९१   क
शव्दं गाण्डीवघोषेण कौन्तेय़ोऽभ्यभवद्वली ||  ९१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति