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शान्ति पर्व
अध्याय ११५
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भीष्म उवाच
यस्यावाच्यं न लोकेऽस्ति नाकार्यं वापि किञ्चन |  १०   क
वाचं तेन न सन्दध्याच्छुचिः सङ्क्लिष्टकर्मणा ||  १०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति