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शान्ति पर्व
अध्याय २९५
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वसिष्ठ उवाच
तदा विशुद्धो भवति प्रकृतेः परिवर्जनात् |  २०   क
अन्योऽहमन्येय़मिति यदा वुध्यति वुद्धिमान् ||  २०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति