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शान्ति पर्व
अध्याय ११५
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भीष्म उवाच
अधीरजुष्टे पथि वर्तमानं; दमादपेतं विनय़ाच्च पापम् |  १७   क
अरिव्रतं नित्यमभूतिकामं; धिगस्तु तं पापमतिं मनुष्यम् ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति