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शान्ति पर्व
अध्याय ११५
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भीष्म उवाच
श्रूय़तां पृथिवीपाल यथैषोऽर्थोऽनुगीय़ते |  २   क
सदा सुचेताः सहते नरस्येहाल्पचेतसः ||  २   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति