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शान्ति पर्व
अध्याय ११५
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भीष्म उवाच
विगर्हणां परमदुरात्मना कृतां; सहेत यः संसदि दुर्जनान्नरः |  २०   क
पठेदिदं चापि निदर्शनं सदा; न वाङ्मय़ं स लभति किञ्चिदप्रिय़म् ||  २०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति