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शान्ति पर्व
अध्याय ११५
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भीष्म उवाच
इति स श्लाघते नित्यं तेन पापेन कर्मणा |  ५   क
इदमुक्तो मय़ा कश्चित्संमतो जनसंसदि |  ५   ख
स तत्र व्रीडितः शुष्को मृतकल्पोऽवतिष्ठति ||  ५   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति