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अनुशासन पर्व
अध्याय ११५
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भीष्म उवाच
अचिन्तितमनुद्दिष्टमसङ्कल्पितमेव च |  १४   क
रसं गृद्ध्याभिभूता वै प्रशंसन्ति फलार्थिनः |  १४   ख
प्रशंसा ह्येव मांसस्य दोषकर्मफलान्विता ||  १४   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति