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शल्य पर्व
अध्याय ३७
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वैशम्पाय़न उवाच
ओघवत्यपि राजेन्द्र वसिष्ठेन महात्मना |  २५   क
समाहूता कुरुक्षेत्रे दिव्यतोय़ा सरस्वती ||  २५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति