वन पर्व  अध्याय ११५

अकृतव्रण उवाच

न चापि भगवान्वाच्यो दीय़तामिति भार्गव |  १३   क
देय़ा मे दुहिता चेय़ं त्वद्विधाय़ महात्मने ||  १३   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति