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वन पर्व
अध्याय ११५
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अकृतव्रण उवाच
धर्मेण लव्ध्वा तां भार्यामृचीको द्विजसत्तमः |  १८   क
यथाकामं यथाजोषं तय़ा रेमे सुमध्यया ||  १८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति