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वन पर्व
अध्याय ११५
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अकृतव्रण उवाच
तं विवाहे कृते राजन्सभार्यमवलोककः |  १९   क
आजगाम भृगुश्रेष्ठः पुत्रं दृष्ट्वा ननन्द च ||  १९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति