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वन पर्व
अध्याय ११५
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अकृतव्रण उवाच
सा वै प्रसादय़ामास तं गुरुं पुत्रकारणात् |  २२   क
आत्मनश्चैव मातुश्च प्रसादं च चकार सः ||  २२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति