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वन पर्व
अध्याय ११५
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भृगुरु उवाच
आलिङ्गने तु ते राजंश्चक्रतुः स्म विपर्ययम् |  २४   क
कदाचिद्भृगुरागच्छत्तं च वेद विपर्ययम् ||  २४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति