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अनुशासन पर्व
अध्याय ५
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युधिष्ठिर उवाच
आनृशंसस्य धर्मस्य गुणान्भक्तजनस्य च |  १   क
श्रोतुमिच्छामि कार्त्स्न्येन तन्मे व्रूहि पितामह ||  १   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति