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वन पर्व
अध्याय ११५
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भृगुरु उवाच
ततः प्रसादय़ामास श्वशुरं सा पुनः पुनः |  २७   क
न मे पुत्रो भवेदीदृक्कामं पौत्रो भवेदिति ||  २७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति