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वन पर्व
अध्याय ११५
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भृगुरु उवाच
स वर्धमानस्तेजस्वी वेदस्याध्ययनेन वै |  २९   क
वहूनृषीन्महातेजाः पाण्डवेय़ात्यवर्तत ||  २९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति