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वन पर्व
अध्याय ११५
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वैशम्पाय़न उवाच
तान्समेत्य स राजर्षिरभिवाद्य कृताञ्जलिः |  ३   क
रामस्यानुचरं वीरमपृच्छदकृतव्रणम् ||  ३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति