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वन पर्व
अध्याय ११५
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अकृतव्रण उवाच
कन्यकुव्जे महानासीत्पार्थिवः सुमहावलः |  ९   क
गाधीति विश्रुतो लोके वनवासं जगाम सः ||  ९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति