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शान्ति पर्व
अध्याय ८३
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मुनिरु उवाच
उषितं शङ्कमानेन प्रमादं परिरक्षता |  ५०   क
अन्तःसर्प इवागारे वीरपत्न्या इवालय़े |  ५०   ख
शीलं जिज्ञासमानेन राज्ञश्च सहजीविना ||  ५०   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति