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शल्य पर्व
अध्याय १०
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सञ्जय़ उवाच
मद्रराजस्तु सङ्क्रुद्धो गृहीत्वा धनुरुत्तमम् |  ११   क
अभ्यद्रवत सङ्ग्रामे पाण्डवानातताय़िनः ||  ११   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति