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अनुशासन पर्व
अध्याय १४
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वासुदेव उवाच
शाकल्यः संशितात्मा वै नव वर्षशतान्यपि |  ६८   क
आराधय़ामास भवं मनोय़ज्ञेन केशव ||  ६८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति