भीष्म पर्व  अध्याय ११५

सञ्जय़ उवाच

कर्णदुर्योधनौ चापि निःश्वसेतां मुहुर्मुहुः |  २०   क
तथा निपतिते भीष्मे कौरवाणां धुरन्धरे |  २०   ख
हाहाकारमभूत्सर्वं निर्मर्यादमवर्तत ||  २०   ग
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति