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आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ४७
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व्रह्मो उवाच
द्वावेतौ पक्षिणौ नित्यौ सखाय़ौ चाप्यचेतनौ |  १५   क
एताभ्यां तु परो यस्य चेतनावानिति स्मृतः ||  १५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति