वन पर्व  अध्याय ६१

दमय़न्त्यु उवाच

इति सा तं गिरिश्रेष्ठमुक्त्वा पार्थिवनन्दिनी |  ५६   क
दमय़न्ती ततो भूय़ो जगाम दिशमुत्तराम् ||  ५६   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति