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भीष्म पर्व
अध्याय ११५
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सञ्जय़ उवाच
अभिनन्द्य स तानेवं शिरसा लम्वताव्रवीत् |  ३२   क
शिरो मे लम्वतेऽत्यर्थमुपधानं प्रदीय़ताम् ||  ३२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति