सभा पर्व  अध्याय ६१

विदुर उवाच

स वै विवदनाद्भीतः सुधन्वानं व्यलोकय़त् |  ६२   क
तं सुधन्वाव्रवीत्क्रुद्धो व्रह्मदण्ड इव ज्वलन् ||  ६२   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति