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अनुशासन पर्व
अध्याय १४
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उपमन्युरु उवाच
मोहितश्चास्मि देवेश तुभ्यं रूपविपर्ययात् |  १६६   क
तेन नार्घ्यं मय़ा दत्तं पाद्यं चापि सुरेश्वर ||  १६६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति