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भीष्म पर्व
अध्याय ११५
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धृतराष्ट्र उवाच
पुनः पुनर्न मृष्यामि हतं देवव्रतं रणे |  ५   क
न हतो जामदग्न्येन दिव्यैरस्त्रैः स्म यः पुरा ||  ५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति