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भीष्म पर्व
अध्याय ११५
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सञ्जय़ उवाच
परिखा खन्यतामत्र ममावसदने नृपाः |  ५०   क
उपासिष्ये विवस्वन्तमेवं शरशताचितः |  ५०   ख
उपारमध्वं सङ्ग्रामाद्वैराण्युत्सृज्य पार्थिवाः ||  ५०   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति