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भीष्म पर्व
अध्याय ११५
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सञ्जय़ उवाच
अनाश्चर्यो जय़स्तेषां येषां त्वमसि केशव |  ६४   क
रष्किता समरे नित्यं नित्यं चापि हिते रतः |  ६४   ख
सर्वथा त्वां समासाद्य नाश्चर्यमिति मे मतिः ||  ६४   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति