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द्रोण पर्व
अध्याय ११५
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सञ्जय़ उवाच
अविध्यदेनं दशभिः पृषत्कै; रलम्वुसो राजवरः प्रसह्य |  १४   क
अनागतानेव तु तान्पृषत्कां; श्चिच्छेद वाणैः शिनिपुङ्गवोऽपि ||  १४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति