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द्रोण पर्व
अध्याय ११५
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सञ्जय़ उवाच
पुनः स वाणैस्त्रिभिरग्निकल्पै; राकर्णपूर्णैर्निशितैः सुपुङ्खैः |  १५   क
विव्याध देहावरणं विदार्य; ते सात्यकेराविविशुः शरीरम् ||  १५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति