विराट पर्व  अध्याय १५

द्रौपद्यु उवाच

न राजन्राजवत्किञ्चित्समाचरसि कीचके |  २४   क
दस्यूनामिव धर्मस्ते न हि संसदि शोभते ||  २४   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति