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द्रोण पर्व
अध्याय ११५
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सञ्जय़ उवाच
तथा तु तेनाभिहतस्तरस्वी; नप्ता शिनेश्चक्रधरप्रभावः |  १७   क
अलम्वुसस्योत्तमवेगवद्भि; र्हय़ांश्चतुर्भिर्निजघान वाणैः ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति