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आदि पर्व
अध्याय ११६
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वैशम्पाय़न उवाच
कथं दीनस्य सततं त्वामासाद्य रहोगताम् |  २०   क
तं विचिन्तय़तः शापं प्रहर्षः समजाय़त ||  २०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति