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आदि पर्व
अध्याय ११६
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वैशम्पाय़न उवाच
प्रहृष्टमनसं तत्र विहरन्तं यथामरम् |  ५   क
तं माद्र्यनुजगामैका वसनं विभ्रती शुभम् ||  ५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति