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अनुशासन पर्व
अध्याय ११६
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भीष्म उवाच
सदा यजति सत्रेण सदा दानं प्रय़च्छति |  १७   क
सदा तपस्वी भवति मधुमांसस्य वर्जनात् ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति